
प्रस्तावना
अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा का वह नाम है जिसने न केवल अभिनय की परिभाषा बदली, बल्कि अपने व्यक्तित्व, आवाज़, अनुशासन और निरंतर संघर्ष के माध्यम से एक संपूर्ण युग को आकार दिया। वे केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक संस्था हैं—ऐसी संस्था जिसने हिंदी सिनेमा को सामाजिक यथार्थ, नैतिक द्वंद्व, नायकत्व और मानवीय संवेदनाओं के नए आयाम दिए। लगभग छह दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा, परिश्रम और आत्मविश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति समय की सीमाओं को पार कर सकता है।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक जीवन
अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर 1942 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ। उनके पिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महान कवि थे, जिनकी कृति मधुशाला आज भी हिंदी साहित्य का मील का पत्थर मानी जाती है। उनकी माता तेजी बच्चन सामाजिक कार्यकर्ता थीं और रंगमंच में भी सक्रिय रहीं। इस प्रकार अमिताभ को साहित्य, संस्कृति और विचारशीलता का संस्कार बचपन से ही प्राप्त हुआ।
उनका बचपन साहित्यिक गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और बौद्धिक चर्चाओं के वातावरण में बीता। घर में विद्वानों, लेखकों और कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई और गंभीरता प्रदान की। यही कारण है कि उनकी भाषा पर पकड़, उच्चारण की स्पष्टता और संवाद अदायगी में एक विशेष गरिमा दिखाई देती है।
शिक्षा और प्रारंभिक संघर्ष
अमिताभ बच्चन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रयागराज के बॉयज़ हाई स्कूल और बाद में नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से प्राप्त की। इसके पश्चात उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की शिक्षा पूरी की। पढ़ाई के दौरान वे गंभीर, अनुशासित और अध्ययनशील छात्र रहे।
स्नातक के बाद उनका झुकाव सिनेमा की ओर हुआ, किंतु यह मार्ग आसान नहीं था। मुंबई पहुंचने पर उन्हें लगातार अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ा। उनकी लंबी कद-काठी, गंभीर चेहरा और भारी आवाज़ उस समय के पारंपरिक नायक की छवि से मेल नहीं खाती थी। कई फिल्म निर्माताओं ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि उनकी आवाज़ रेडियो के लिए उपयुक्त नहीं है। यही वही आवाज़ थी, जिसने आगे चलकर करोड़ों लोगों को मंत्रमुग्ध किया।
सिनेमा में प्रवेश
अमिताभ बच्चन ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1969 में फिल्म सात हिंदुस्तानी से की। यह फिल्म व्यावसायिक रूप से बहुत सफल नहीं रही, लेकिन अमिताभ के अभिनय को समीक्षकों ने सराहा। इसी वर्ष उन्होंने मृणाल सेन की फिल्म भुवन शोम में कथावाचक के रूप में अपनी आवाज़ दी, जिसने उनकी वाणी की शक्ति को पहली बार व्यापक पहचान दिलाई।
शुरुआती वर्षों में उन्हें सहायक और छोटे रोल ही मिले। आनंद (1971) में डॉ. भास्कर बनर्जी की भूमिका ने उन्हें पहली बड़ी पहचान दी। इस फिल्म में राजेश खन्ना के साथ उनकी सादगीपूर्ण, संवेदनशील और गंभीर अभिनय शैली ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इसी भूमिका के लिए उन्हें अपना पहला फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
अभिनय शैली और व्यक्तित्व
अमिताभ बच्चन की अभिनय शैली में गंभीरता, आंतरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति और शारीरिक भाषा का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। उनकी आंखें संवादों से पहले ही कहानी कह देती हैं। वे चरित्र में पूरी तरह डूब जाते हैं—चाहे वह एक मजदूर हो, पुलिस अधिकारी, अपराधी, कवि या वृद्ध पिता।
उनकी आवाज़ उनकी सबसे बड़ी पहचान है। भारी, गूंजदार और प्रभावशाली स्वर ने उनके पात्रों को असाधारण शक्ति दी। यही कारण है कि वे उद्घोषणा, कथावाचन और विज्ञापन की दुनिया में भी समान रूप से सफल रहे।
व्यक्तिगत जीवन
अमिताभ बच्चन का विवाह 1973 में अभिनेत्री जया भादुड़ी से हुआ। जया बच्चन स्वयं एक सशक्त अभिनेत्री और राजनेता हैं। उनके दो संतानें हैं श्वेता बच्चन नंदा और अभिषेक बच्चन। बच्चन परिवार भारतीय सिनेमा और समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान रखता है।
अपने निजी जीवन में अमिताभ अनुशासित, समयनिष्ठ और पारिवारिक मूल्यों को मानने वाले व्यक्ति हैं। वे कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और गरिमा बनाए रखते हैं, जो उन्हें एक आदर्श सार्वजनिक व्यक्तित्व बनाता है।
ऐतिहासिक सफलता
1975 में रिलीज़ हुई फिल्म शोले भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिनी जाती है। जय के किरदार में अमिताभ बच्चन ने मित्रता, त्याग और साहस का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसने दर्शकों की स्मृति में अमिट छाप छोड़ी। धर्मेंद्र के साथ उनकी जोड़ी आज भी हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ जोड़ियों में मानी जाती है। यह फिल्म न केवल व्यावसायिक रूप से सफल रही, बल्कि इसके संवाद, गीत और चरित्र भारतीय लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गए।
सामाजिक यथार्थ का प्रतीक
दीवार (1975) में विजय वर्मा का किरदार अमिताभ बच्चन के करियर का मील का पत्थर माना जाता है। यह फिल्म सामाजिक अन्याय, वर्ग संघर्ष और नैतिक द्वंद्व को दर्शाती है। एक ईमानदार पुलिस अधिकारी और अपराध की दुनिया में फंसे भाई के बीच का टकराव दर्शकों को गहराई से प्रभावित करता है। यह किरदार आम आदमी के गुस्से और असहायता का प्रतीक बन गया।
शैलीगत विविधता
डॉन (1978) में अमिताभ बच्चन ने दोहरे किरदार निभाकर यह सिद्ध किया कि वे केवल गंभीर भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं। अपराधी डॉन और साधारण विजय की भूमिका में उनका अभिनय, शारीरिक हावभाव और संवाद अदायगी अत्यंत प्रभावशाली रही। इसी फिल्म ने उनके स्टाइल, फैशन और करिश्माई व्यक्तित्व को नई पहचान दी।
सफल फिल्मों की श्रृंखला
इस दौर में त्रिशूल, काला पत्थर, सत्ते पे सत्ता, नमक हलाल, लावारिस और मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्मों ने उन्हें बॉक्स ऑफिस का निर्विवाद बादशाह बना दिया। वे ऐसे अभिनेता बन गए जिनकी उपस्थिति मात्र से फिल्म सफल मानी जाती थी। निर्माता-निर्देशक उनके साथ काम करने को उत्सुक रहते थे।
कुली दुर्घटना
1982 में फिल्म कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन एक गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए। एक स्टंट के दौरान उन्हें आंतरिक चोटें आईं और उनकी हालत अत्यंत नाजुक हो गई। पूरा देश उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहा था। यह वह क्षण था जब दर्शकों के साथ उनका भावनात्मक संबंध और भी गहरा हो गया।
जीवन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन
इस दुर्घटना के बाद अमिताभ बच्चन के जीवन और अभिनय में एक गंभीरता और आत्ममंथन दिखाई देने लगा। वे पहले से अधिक अनुशासित और आत्मचिंतनशील हो गए। इस अनुभव ने उन्हें जीवन की नश्वरता और जिम्मेदारियों का एहसास कराया।
असफलताएँ
1980 के दशक के उत्तरार्ध में कुछ फिल्मों की असफलता ने उनके करियर को प्रभावित किया। दर्शकों की पसंद बदल रही थी और नए कलाकार उभर रहे थे। इस दौर में उन्हें आलोचना और आत्मसंशय का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने हार नहीं मानी।
राजनीति में प्रवेश
अमिताभ बच्चन ने 1984 में राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव जीता। हालांकि राजनीति का अनुभव उनके लिए संतोषजनक नहीं रहा। उन्होंने इसे छोड़कर पुनः सिनेमा की ओर रुख किया।
आर्थिक संकट
1990 के दशक में उनकी कंपनी एबीसीएल (Amitabh Bachchan Corporation Limited) को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। वे लगभग दिवालिया हो गए। यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर माना जाता है।